लालची 420 देवरानी की कहानी।

लालची 420 देवरानी की कहानी

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लालची 420 देवरानी - Lalchi Devrani Moral Story In Hindi

Story In Hindi – एक समय की बात है एक गाँव में एक कुशल परिवार रहता था उस परिवार में सुधा जी नाम की एक वृद्ध महिला रहती थी। सुधा जी की दो बेटी और बहुये थी जो उनके साथ ही रहती थी।

बड़े बेटे अशोक की पत्नी नमृता संस्कारी और सर्वगुण स्वपन्न थी वही छोटे बेटे की पत्नी अनाया चालाक और बहुत तेज़ तेज़ दरार थी एक बार की बात है सुधा जी और नमृता मिलकर बहुत सारे लड्डू बनाकर रसोई में रख देते है।

सुधा जी बहु मैं मिश्रा जी के वहां कुछ काम से जा रही हूँ तुम लड्डू को थोड़े देर बाद डब्बे में रख देना।

ये बोलकर सुधा जी बाहर चली जाती है नमृता अपने बेटे की आवाज सुनकर उसे देखने चली जाती है तभी अनाया रसोई में आती है शुद्ध देशी घी के लड्डू देख उसके मुँह में पानी आ जाता है और एक लड्डू खा लेती है।

अनाया – वाह… इतने इतने स्वादिष्ट लड्डू मैंने कभी नहीं खाये। एक काम करती हूँ सारे लड्डू डिब्बे में रख लेती हूँ और एक प्लेट में ही छोड़ दूंगी जिससे किसी को मुझ पर सक भी नहीं होगा और मैं आराम से खा पाऊँगी।

वह लड्डू की प्लेट उठाकर एक डिब्बे में भरकर चुपके से अपने कमरे में ले जाती है और प्लेट में एक लड्डू वही छोड़ देती है अपने कमरे में जाकर अनाया पेट भर लड्डू खाती है।

पेट भर जाने पर वह लड्डू के डिब्बे को छुपा देती है। नमृता अपने बेटे कार्तिक को सुला रही थी तभी सुधा जी घर आ जाती है।

सुधा जी – नमृता अरे ओ नमृता..

नमृता सास की आवाज सुनकर भागी हुयी आती है।

नमृता – जी माँ जी बुलाया आपने।

सुधा जी – बेटा जरा चाय बना देना और हां लड्डू भी ले आना एक दो खा लुंगी।

नमृता रसोई में जाती है और लड्डू का खाली प्लेट देखकर चौक जाती है।

नमृता – लड्डू कहा गए, मैंने तो डिब्बे में भी नहीं रखे प्लेट में तो एक ही लड्डू है अभी माँ को बताती हूँ।

नमृता सुधा जी को जाकर बात बता देती है।

नमृता – माँ जी लड्डू रसोई में नहीं है मैंने वही रखे थे पर अब नहीं है।

सुधा जी – क्या लड्डू तो तेरे सामने ही बनाये थे फिर कहा गए।।

नमृता – पता नहीं माँ जी कार्तिक रो रहा था तो मैं कार्तिक के पास चली गयी उसे सुलाकर अभी आपकी आवाज सुनकर आ रही हूँ।

सुधा जी रसोई में जाती है अनाया लड्डू से भरा मुँह जल्दी-जल्दी साफ़ करती है और रसोई में आती है।

अनाया – क्या हुआ मम्मी जी आप गुस्से में क्यों हो।

सुधा जी – बहु यहाँ लड्डू के प्लेट रखे थे अब देखो इसमें एक भी लड्डू नहीं पता नहीं कौन खा गया शुद्ध घी के लड्डू थे।

तभी अशोक और राहुल भी आ जाते है और रसोई से लोगो की बातो को देख दोनों रसोई की और जाते है अशोक अपने माँ से मजाक में कहता है।

अशोक – क्या हुआ माँ, क्या हुआ माँ किस गहन विषय पर चिंतन चल रहा है।

सुधा जी – अरे देखो ना बेटा शुद्ध घी के लड्डू बनाये थे पता नहीं कौन खा गया अब इसमें एक भी नहीं है।

अनाया – आप के बाहर जाने के बाद तो नमृता दीदी ही ना थी रसोई में सायद कही उन्होंने ही…

नमृता – अनाया ये क्या बोल रही हो तुम मैं कार्तिक के पास थी।

सुधा जी और घर के सभी सदस्य अनाया की बात पर विश्वाश कर लेते है और नमृता के खिलाफ हो जाते है सभी नमृता को खूब सुनाते है तो वो रोने लगती है। अनाया बहुत खुश होती है वो खुद से कहती है “इन लोगो को बेवकूफ बनाना कितना आसान है”

कुछ दिन बाद सुधा जी काजू और बादाम खरीद कर लती है और नमृता को संभाल कर रख देने के लिए कहती है। सुधा जी ये कहकर वह से चली जाती है।

नमृता काजू और बादाम के डब्बे को अलमारी में रख देती है अनाया काजू बादाम का डिब्बा देख लेती है और रोज़ मुट्ठी भर कर के खूब काजू बादाम खाती है और इसी तरह एक ही हप्ते में काजू बादाम ख़त्म हो जाते है।

सुधा जी – अरे नमृता तुझे काजू बादाम लेकर दिए थे तू तो दिखा भी नहीं रही की कहा रख दिए हमें भी दिखा दे हम भी दर्शन कर लेंगे या मंदिर में रखकर पूजा करेगी तू।

नमृता – जी माँ जी अलमारी में रखे है अभी लेकर आती हूँ।

ये बोलकर नमृता रसोई में जाती है और काजू-बादाम का डिब्बा निकालती है पर डिब्बे में तो काजू बादाम ना के बराबर थे ये देखकर नमृता चौक जाती है और रोने लगती है।

नमृता की रोने की आवाज सुनकर सुधा जी और घर के सारे सदस्य रसोई में आते है नमृता को रोता देख सुधा जी बोलती है।

सुधा जी – अरे क्या हुआ…  रो क्यों रही हो।

नमृता – माँ जी काजू बादाम यही रखे थे पता नहीं कहा गए।

सुधा जी – क्या चार दिन पहले ही तो लायी थी काजू बादाम का डिब्बा और ख़त्म भी हो गया।

अनाया अपनी चोरी छुपाने के लिए फिर नमृता पर इल्जाम लगा देती है और कहती है।

अनाया – नमृता जी खाने का मन था तो खाइये लेकिन ऐसे चोरी करना ठीक नहीं है दीदी।

सुधा जी – पता नहीं इस घर में क्या हो रहा है खाने की भी चोरी। अरे बहु थोड़ा बहुत दुसरो को भी चखा दिया करो इस घर में और भी लोग रहते है यह बोलकर सभी चले जाते है और नमृता रोने लगती है।

कुछ दिन बाद अनाया की दोस्त रिया का फ़ोन आता है।

रिया – हेलो अनाया, कैसी हो।

अनाया – मैं ठीक हूँ और तुम बताओ। इतने दिनों बाद कॉल किया।

रिया – घर के काम में ना बिजी रहती हूँ। चलो ना हम दोनों कल मिलते है शॉपिंग करेंगे खाएंगे पियेंगे।

अनाया – अच्छा ठीक है कल मिलते है वैसे भी शादी को दो महीने हो गए कही घूमने भी नहीं गयी मैं, राहुल को तो टाइम भी नहीं मिलता।

रिया – ठीक है ना तो कल मिलते है तू तैयार रहना।

अनाया खुद से कहती है “मैंने रिया को हां तो बोल दिया, पर पैसे कहा से लाऊंगी बाहर जाने का मतलब पैसो का खर्च होना” अब अनाया पैसो की जुगाड़ में लगी है वो सुधा जी के कमरे से गुजरती है तभी अशोक सुधा जी को दस हजार रूपये रखने के लिए देता है।

अब रात होते ही अनाया सुधा जी के कमरे में जाती है और दस हजार की गड्डी चुरा लेती है सुबह होते ही अशोक दस हजार सुधा जी से मांगता है।

अशोक – माँ वो दस हजार दिए थे ना वो देना दोस्त को वापस करने है वह लेने के लिए आ रहा है।

सुधा जी कमरे में पैसा लेने जाती है जैसे ही अलमारी खुलती है तो पैसे कही नहीं मिलते सुधा जी चिल्लाती है। चिल्लाने की आवाज सुनकर सुधा जी के सभी सदस्य सुधा जी के कमरे में जाते है।

अशोक – क्या हुआ माँ अब चिल्ला क्यों रही हो और इतनी घबड़ायी हुयी क्यों हो।

सुधा जी – मैंने यही दस हजार रखे थे अब नहीं है पता नहीं कहा चले गए।

अशोक – नहीं है मतलब, माँ वो पैसे मेरे दोस्त के थे वो आने वाला है मैं कहा से लाकर दूंगा उसे।

सुधा जी – कही ये काम बाहर के किसी आदमी का तो नहीं, लेकिन हमारे घर में कोई आता भी तो नहीं।

अशोक – हां माँ आप सही कह रही है अब मैं पुलिस को ही बुलाता हूँ।

सुधा जी – हां यही ठीक रहेगा, हमारे घर में कुछ ना कुछ चोरी हो रहा है अब ये पैसे भी चले गए। तू बुलाले बेटा पुलिस को।

पुलिस का नाम सुनते ही अनाया घबड़ा जाती है। अशोक का दोस्त पैसे लेने आता है ये देखकर नमृता जल्दी से अपने कमरे में जाती है और अपने बचाये हुए पैसे लाकर अशोक को दे देती है।

नमृता के पास दस हजार देखकर सब लोग नमृता पर सक करने लगते है।

सुधा जी – ये पैसे कहा से आये तुम्हारे पास बहु।

नमृता – माँ जी ये हमारे बचत किये हुए पैसे है।

सुधा जी – बचत किये हुए या फिर चुराए हुए देख बहु सच बता दे।

अनाया की जान में जान आती है वो भी नमृता को कहने लगती है।

अनाया – नमृता दी अब इसकी भी चोरी की हद हो गयी अपने ही घर में चोरी दीदी आपको ये बातें सोभा नहीं देती।

तभी पुलिस आ जाती है पुलिस को देख अनाया घबड़ा जाती है। पुलिस नमृता से पूछताछ करती है और नमृता बेगुनाह साबित होती है फिर पुलिस जब घर में एक-एक कमरे की तलाशी लेती है अनाया पूरी तरह से घबड़ा जाती है क्योकि अब पुलिस अनाया की कमरे की तलाशी ले रही है।

पुलिस को नोट की गड्डी अलमारी में कपडे के नीच रखे मिल जाती है साथ में काजू बादाम का डिब्बा और एक दो लड्डू भी, सब चौक जाते है। अनाया फुट-फुट कर रोने लगती है।

अनाया – माफ़ कर दीजिये मुझे, मुझसे गलती हो गयी माफ़ कर दीजिये।

सुधा जी – सब कुछ तुमने चुराया और मेरी बहु नमृता को दोषी बनाया।

अनाया रोने लगती है और नमृता से भी माफ़ी मांगती है।

नमृता – कोई बात नहीं अनाया तुम्हे इस घर में चोरी करने की कोई जरुरत नहीं है तुम्हे कुछ भी चाहिए तो तुम हम सबसे कह सकती हो तुम्हारी एक गलती ने तुम्हे कितनी बड़ी मुसीबत में डाल दिया था।

अनाया – मैं आप सब से माफ़ी मांगती हूँ आगे से ऐसा कभी नहीं करुँगी।

नमृता अनाया को गले लगा लेती है और सुधा जी नमृता से माफ़ी मांगती है और नमृता सबको माफ़ कर देती है और अब से सब ख़ुशी ख़ुशी जिंदगी जीते है।

उम्मीद करते है की लालची 420 देवरानी स्टोरी आपको जरूर पसंद आयी होगी ऐसी ही और स्टोरी के लिए ब्लॉग ऑफ़ इंडिया पे आकर देख सकते है।

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